पढ़िए प्रभासपुरम के राजा प्रभास कुमार की गौरव गाथा





नमस्कार दोस्तों मेरा नाम हैं प्रतीक मल्होत्रा और आज में आपको बताने जा रहा एक ऐसी कहानी जिससे आपको जिंदगी में सफलता के लिए भगवान् को रिश्वत नहीं देना पड़ेगा “(श्रद्धा से पैसे चढ़ाये तो अलग बात हैं) लेकिन किसी काम को बनवाने के लिए पैसे चढ़ाये तो वो रिश्वत ही होता हैं” |

मैं जल्दी से कहानी शुरू कर देता हूँ लेकिन आपको बतादूँ इस कहानी को अगर आपने पूरा पढ़ लिया तो आपके जीवन में जब भी कठिन दौर आएगा आपका आत्मबल बहुत अधिक बढ़ जाया करेगा | जिससे आप मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों को पलट कर अपना रास्ता खुद त्यार कर लिया करेंगे |

यह कहानी हैं प्रभासपुरम राज्य की जो की उस समय में बहुत ही ज्यादा वैभवशाली था और उस राज्य के राजा का नाम प्रभास कुमार था | वह बहुत ही ज्यादा साहसी, चतुर राजा होने के साथ-साथ वीर योद्धा भी था | राज्य की प्रजा बहुत ही सुखी और समृद्ध थी इसी के चलते दूसरे राज्य के राजा भीम सिंह ने प्रभासपुरम पर हमला कर दिया |

आपको बता दें की भीम सिंह के पास लगभग एक लाख सैनिको का बल था वही राजा प्रभास कुमार के पास केवल पचीस हजार सैनिको का बल था | लेकिन सैनिक बल की गिनती राजा प्रभास कुमार के हौंसलो को ध्वस्त नहीं कर पायी और उन्होंने एक सच्चे योद्धे का प्रमाण देते हुए आपने पचीस हजार सैनिको के साथ रण भूमि में कूद पड़े |

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लेकिन राजा भीम सिंह की सेना के आगे राजा प्रभास कुमार की सेना टूटनी शुरू हो गयी बहुत मुश्किल से युद्ध का पहला दिन राजा प्रभास कुमार की सेना ने ख़तम किया | फिर भी युद्ध ख़तम होते होते राजा प्रभास कुमार की सेना के बहुत सारे सिपाही शहीद हो चुके थे |

राजा प्रभास कुमार का मनोबल भी कमजोर होने लगा था | राजा प्रभास कुमार एक वीर योद्धा थे इसलिए वो जल्दी से अपने मनोबल को टूटने नहीं दें सकते थे उनको मालूम था चार गुना सेना के आगे जीत लगभग असंभव हैं लेकिन अगर पूरी ताक़त के साथ युद्ध किया जाए तो हम इस युद्ध को जीत भी सकते हैं |

लेकिन अब यह बात उस सेना को समझानी थी जिसका मनोबल आपने साथियो के शहीद होने के साथ ही टूट चूका था और इस बात अंदाजा राजा प्रभास कुमार का था अगर बिना मनोबल के साथ रण भूमि में उतरे तो हार निश्चित हैं |

इसलिए राजा प्रभास कुमार ने अपने सेनापति को बुलाया और कहा मैं इस मुश्किल घडी का हल जानने के लिए अपने गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी के आश्रम में जा रहा हूँ और इतना कहकर वो जंगल के रास्ते आश्रम की और चल पड़े |

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फिर कुछ देर बाद राजा प्रभास कुमार हाथ में एक चमचमाती तलवार और एक पानी का घड़ा अपने हाथ में लिए हुए सेनापति के पास आ पहुंचे और सेनापति को आदेश दिया की सारे योद्धाओं को यहाँ पर बुलाया जाए |

सब सैनिक हैरान थे की इतनी रात को राजा ने किस काम के लिए हमें इकठा किया हैं इतने में राजा प्रभास कुमार ने कहा मैं हमारी जीत की मनोकामना को लेकर अपने गुरूजी महाराज शिवप्रकाश जी के आश्रम में गया था | तभी में गुरूजी ने बताया की खुद भगवान् ने राज्य प्रभासपुरम की जीत निश्चित की हैं समय कठिन हैं लेकिन अंत में जीत आपकी ही होगी |

राजा प्रभास कुमार ने कहा गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी ने मुझे आशीर्वाद के तौर पर यह अजेय तलवार और अमृत दिया हैं, इस अमृत को सभी सैनिको पर छिड़क दो जिनसे यह सब भगवान् की कृपया से अजय हो जायेंगे |

इस घोषणा के तुरंत बाद सभी सैनिक आत्मबल से भरपूर हो गए उन्होंने अपनी तलवारो को अमृत में भिगोया और खुद के ऊपर छिड़क लिया उनके मन में अब बस एक ही बात थी की उनकी तलवारे दुश्मनों को गाजर मूली की तरह काट देंगी और अंत में जीत हमारी होगी |

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उसके बाद बिलकुल वही हुआ जैसा की राजा प्रभास कुमार ने सोचा था एक एक सैनिक दुश्मन सेना के दस दस सैनिको को मार रहा था | युद्ध ऐसे चल रहा था जैसे प्रभासपुरम की सेना कभी किसी से हार ही नहीं सकती | पूरी ताक़त से युद्ध लड़ने के बाद अंत में जीत प्रभासपुरम की हुई |

राज्य की प्रजा बहुत जोर शोर जश्न मनाने लगे और जब गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी को पता चला की प्रभासपुरम ने युद्ध जीत लिया हैं तो वो भी जीत की बधाई देने के लिए राजा के दरबार में पहुँच गए | सारा राज्य दरबार गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी का धन्यवाद करने लगा जिसे देख गुरु अचंभित हो गए |

गुरूजी महाराज शिवप्रकाश जी ने सबको शांत करवाया और कहा यह जीत आप लोगो के साहस की वजह से हुई हैं इसलिए इस जीत का पात्र मैं नहीं हूँ | यह बात सुनकर सारा राज्य दरबार शांत और हैरान हो गया |

तभी सेनापति ने कहा क्षमा कीजिये गुरूजी लेकिन अगर आपने राजा प्रभास कुमार के हाथो वो अजय प्रशाद का अमृत न भिजवाया होता तो आज यह युद्ध हम नहीं जीत सकते थे, हमारे सभी शस्त्र उस अजय प्रशाद के अमृत के बिना बेकार थे |

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गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी सब समझ गए और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा यह जीत न तो मेरी हैं और न ही आपकी यह जीत आपके राजा प्रभास कुमार की हैं | सेना पति ने सवाल किया क्षमा करें गुरूजी लेकिन कैसे ? तब गुरूजी महाराज शिवप्रकाश जी बोले न तो आपके राजा प्रभास कुमार मेरे पास आये थे और न ही मैंने कोई उनको अजय प्रशाद का अमृत दिया था |

यह सारी तरकीब आपके राजा प्रभास कुमार ने अपनी सूझ बूझ का इस्तेमाल करते हुए आपका मनोबल बढ़ाने के लिए की थी | सेनापति ने सवाल किया की इसका मतलब भगवान् ने यह सुनिश्चित नहीं किया था की जीत प्रभासपुरम राज्य की होगी ?

गुरुजी महाराज शिवप्रकाश जी ने कहा नहीं हार और जीत भगवान् तय नहीं करता बल्कि आपका मन तय करते हैं | जब आप सोच ले की अब आपसे यह काम नहीं होगा तो दुनिया की कोई ताक़त आपसे वो काम नहीं करवा सकती, वही आप अपने मनोबल के साथ पूरी लगन से कोई काम करे तो दुनिया की कोई ताक़त आपसे वो कामयाबी छीन नहीं सकती |

इसलिए यह जीत आप अपने राजा प्रभास कुमार और अपने मनोबल को समृप्त करें आपके राजा ने जिस चतुराई के साथ आपका मनोबल बढ़ाया हैं वो वाकई क़ाबलियत तारीफ हैं |

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यह कहानी आत्मबल, मनोबल, और आत्मविश्वास का ऐसा उदाहरण हैं जिसके बाद आप अपनी जिंदगी में बुरी से बुरी परिस्थिति में भी अपना धैर्य खोये बिना अपनी सूझ बूझ से बाहर आ जायेंगे | याद रखें जो काम आप अपने आत्मबल, मनोबल, और आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं वो काम आपकी तक़दीर, हाथो की लकीरे या फिर रिश्वत के पैसे नहीं कर सकते |

तो कैसी लगी आपको यह कहानी अगर कोई सुझाव हो तो कमेंट और शेयर करना मत भूलियेगा आपका एक शेयर मुझे दस और शेयर दिलवा सकता हैं (इसे शास्त्रों में स्वार्थी होना कहा जाता हैं) |

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