जब एक बलात्कारी ने नर्स से कहा तुम मेरा क्या उखाड़ लोगी

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भारत में बलात्कार के मामले है जो रुकने का नाम नहीं ले रहे | हमारे देश का कानून भी ऐसा है की कई बार पीड़िता को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, कुछ मामलो में समाज के डर या निजी कारणों से पीड़िता रपट ही नहीं लिखवाती, कई बार देखा गया है की आरोपी आराम से जमानत के बल पर बहार खूम रहा होता है, ले देकर अगर कोई सख्त सज़ा होती भी है तो उस फैसले के आने तक आरोपी बूढ़ा हो चूका होता है या फिर मर चूका होता है |


यही कारण है की इस देश में बलात्कार के मामले धाम्ने का नाम ही नहीं ले रहे | बहुत ही कम मामलो या कह लीजिये बहुत ही गिने चुने मामलों में आरोपी को जल्द से जल्द सज़ा सुना दी जाती है चाहे वो उम्रकैद की हो या फांसी की लेकिन मौत की सज़ा सुनाने के बाद भी उसे फांसी पर चढ़ाने को कई साल लगा दिए जाते है | शायद यही कारण है की इतना ढीला कानून होने की वजह से देश में बलात्कार के मामले रुकने का नाम नहीं लेते |

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लेकिन मौत की सज़ा या फिर उम्रकैद से कोई फर्क पड़ेगा ? आखिर कितने लोगो को देश में बलात्कार के मामले पर मौत की सज़ा हुई है ? उम्रकैद में व्यक्ति सलाखों के पीछे क्या कर रहा है इसका अंदाजा हम कैसे लगा सकते है ? क्या आपको नहीं लगता जिस प्रकार पीड़िता साड़ी उम्र उस घटना के साये में पल पल मरती है उसी प्रकार यह घिनोना काम करने वाले व्यक्ति को कुछ इसी प्रकार की सज़ा होनी चाहिए |

वैसे देखा जाये तो सज़ा ऐसी होनी चाहिए जिसके नाम भर से व्यक्ति की रूह अंदर तक कांप जाये और सज़ा भुक्तने वाले को सारी उम्र अपनी गलती का एहसास रहे | अगर हम हाथ पाँव काटने या फिर रेप करने वाले पुरुष का लिंक काटने का सुझाव दे तो देश में “Human Rights” वाले ऐसे बर्ताव करेंगे जैसे उनके बाप का अगला हिस्सा काट रहे हो और क्योंकि इन मामलों में ज्यादातर मुस्लिम धर्म के लोग पकडे जाते है तो मुस्लिम प्रेमी राजनैतिक पार्टियां भी ऐसे बर्ताव करेंगी जैसे उनकी बेटी की शादी की रात उनके जमाई का अगला हिस्सा काटा जा रहा हो |

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अगर हम कपड़ो, फिल्मो, लड़की के बर्ताव आदि की बात करे तो मूर्खता वाली बात है 6 साल की बच्ची से लेकर 80 साल की औरत तक का लोग रेप कर देते है, कपड़ो, फिल्मों, लड़की के बर्ताव से बलात्कार के मामले नहीं रुकने वाले, अगर रोकना है इन मामलों को तो सख्त कानून बनाने होंगे, नहीं तो जिसका रेप होता है दोष भी उसी को देने वाले इस समाज में इंसानियत के नाम पर भद्दे कलंक जैसे लोग आज भी जिन्दा है |

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